आस्था,आध्यात्म, आत्मशान्ति का बोधप्राय ,स्थान,गोधनदेव बाबा भूतभावन का मन्दिर
(आलोक गौड-नई सोच)
फतेहपुर।पश्चिमी छोर पर कलिमलनाशनी, भगीरथी व कृष्णप्रिये यमुना के मध्य दोआबा की सरजमी पर मलवाँ विकास खण्ड के गोधरौली गाँव के बनियनखेडा संपर्क मार्ग पर हाबडा ,दिल्ली रेल लाइन के पार यह भोले नाथ का पौराणिक स्थान स्थित है।गोधरौली गाँव के नाम का प्रदुर्भाव ही इसी स्थान के नाम से है।यहाँ सावन मास में स्थानीय वाशिन्दों के साथ दूर दूर से भक्त सोमवार को आकर भगवान भोलेनाथ को विल्लुपत्र,धतूरा,भाँग ,फूलफल समर्पित कर अपने को कृतकृत्य करते हैं। यद्यपि यह कृम 12 मास जारी रहता है।शिवरात्री पर मेला व फाग का आयोजन होता है।
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सन्त रैदासबाबा व दाता महराज,गुरु शिष्य की तपोभूमि यही है
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यहाँपर रैदासबाबा व दाता महराज ने रहकर तपोपरान्त ,नश्वरशरीर का परित्याग किया,जिनकी समाधि मन्दिर परिसर प्रवेश पर विद्यमान है।
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अध्यरात्री को घोडे पर सवार होकर पूजती है राजशक्ति
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आज भी यहाँ भगवान के शिवलिंग को कोई दिव्यात्मा जो पुरातनकाल में राजशक्ति के रूप में थी आज भी घोडों में सवार होकर पुष्पाजली देने आती है ,यहाँ रमने वालों को घोडो के टापों की आवज आज भी सुनायी देती है।यह किवन्दती नही यथार्थ है की शिवलिंग पर ताजे फूल प्रातः चढे मिलते हैं।
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झाडीबाबा की समाधि कौतुहल का केन्द्र
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आज भी झाडीबाबा की समाधिपर किसी ने एक मिट्ठी का कण कभी नहीं रखा,न पानी घुला सका न झंझावातो ने झकझोरा, केवल दीमक की भीट की मिट्टी की तरह ,आस्था का विषय बनी हुयी है,बुजुर्गों ने बताया यहाँ शोध के लिये विदेशी वैग्यानिक आया करते थे पर कोई निष्कर्ष निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा, आज भी यहाँ आस्था से भक्त नमन करते हैं।
(आलोक गौड-नई सोच)
फतेहपुर।पश्चिमी छोर पर कलिमलनाशनी, भगीरथी व कृष्णप्रिये यमुना के मध्य दोआबा की सरजमी पर मलवाँ विकास खण्ड के गोधरौली गाँव के बनियनखेडा संपर्क मार्ग पर हाबडा ,दिल्ली रेल लाइन के पार यह भोले नाथ का पौराणिक स्थान स्थित है।गोधरौली गाँव के नाम का प्रदुर्भाव ही इसी स्थान के नाम से है।यहाँ सावन मास में स्थानीय वाशिन्दों के साथ दूर दूर से भक्त सोमवार को आकर भगवान भोलेनाथ को विल्लुपत्र,धतूरा,भाँग ,फूलफल समर्पित कर अपने को कृतकृत्य करते हैं। यद्यपि यह कृम 12 मास जारी रहता है।शिवरात्री पर मेला व फाग का आयोजन होता है।
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सन्त रैदासबाबा व दाता महराज,गुरु शिष्य की तपोभूमि यही है
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यहाँपर रैदासबाबा व दाता महराज ने रहकर तपोपरान्त ,नश्वरशरीर का परित्याग किया,जिनकी समाधि मन्दिर परिसर प्रवेश पर विद्यमान है।
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अध्यरात्री को घोडे पर सवार होकर पूजती है राजशक्ति
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आज भी यहाँ भगवान के शिवलिंग को कोई दिव्यात्मा जो पुरातनकाल में राजशक्ति के रूप में थी आज भी घोडों में सवार होकर पुष्पाजली देने आती है ,यहाँ रमने वालों को घोडो के टापों की आवज आज भी सुनायी देती है।यह किवन्दती नही यथार्थ है की शिवलिंग पर ताजे फूल प्रातः चढे मिलते हैं।
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झाडीबाबा की समाधि कौतुहल का केन्द्र
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आज भी झाडीबाबा की समाधिपर किसी ने एक मिट्ठी का कण कभी नहीं रखा,न पानी घुला सका न झंझावातो ने झकझोरा, केवल दीमक की भीट की मिट्टी की तरह ,आस्था का विषय बनी हुयी है,बुजुर्गों ने बताया यहाँ शोध के लिये विदेशी वैग्यानिक आया करते थे पर कोई निष्कर्ष निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा, आज भी यहाँ आस्था से भक्त नमन करते हैं।

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